sangrsh hindi kavita- संपूर्णानंद मिश्र
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| sangarsh hindi kavita |
संघर्ष
कामयाबी की
सीढ़ियों पर
चढ़ना चाहिए
हमेशा धीरे-धीरे
ख़तरा होता है
ऊंची छलांग में
ऊंची छलांग में
शिनाख़्त मिटा देता है
आदमी अपनी
भय होता है
हमेशा गिरने का
खिसक जाती है
अपनी ज़मीन
सुननी चाहिए
आत्मा की आवाज़
संघर्ष की भट्ठी में
तपाना चाहिए अपने को
कुंदन बनने के लिए
ज़रूरत पड़ती है
तीक्ष्ण आंच की
जलाना पड़ता है स्व को
गलाना भी पड़ता है
तब मिलता है
एक नया आकार
चाहे जितना तोड़ो
जितना मोड़ो
नहीं कम होता है
मूल्य उसका
नहीं होना चाहिए पलायित
चोटी पर खड़ा रहना निरन्तर
जोख़िम है
सबसे ज़्यादा ख़तरा है
गिरने का वहां से
संभालने वाला
कोई नहीं है वहां
भागना जीवन नहीं मृत्यु है
कला आनी चाहिए
जीवन जीने की
कला आनी चाहिए
मरने की भी
प्रतीक्षा करनी
चाहिए वक्त की
वक्त हरा जख्म़ है
तो वक्त ही
उसका मलहम है
नहीं पालना चाहिए वहम
लड़ना चाहिए
कुरीतियों से डटकर
लड़ना चाहिए
अपने से भी
सावधान होकर
सतर्क रहकर
महादेव बनने के लिए
पीना पड़ता है गरल
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| डॉ. संपूर्णानंद मिश्र |
डॉ.संपूर्णानंद मिश्र
प्रयागराज फूलपुर


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