father day special
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पिता पर गीत **
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जीवन रूपी पगडंडी पर,
चलते रहे पिता।
जीवन भर लकड़ी बनके,
जलते रहे पिता।
गर्मी चाहे कितनी भी हो,
छाया समझ लिया।
दो पांवों पर चल खुद को,
चौपाया समझ लिया।
अपने सिर पर सबका बोझ,
उठाते रहे पिता।
जीवन भर लकड़ी बनके,
जलते रहे पिता।
चाहे जितनी राह कठिन हो ,
मुड़कर कभी न देखा।
उनके चेहरे पर मायूसी की,
कभी न देखी रेखा।
अपने अंदर घुट-घुट करके,
जीते रहे पिता।
जीवन भर लकड़ी बनके,
जलते रहे पिता।
आसमान सी ऊंचाई वे,
दिल में रखते हैं।
सुख-दु:ख के वे कटु अनुभव को,
चखते रहते हैं।
खुद से ही वे अपना दर्द,
छिपाते रहे पिता।
जीवन भर लकड़ी बनके,
जलते रहे पिता।
पिता के अंदर गहराई,
होती सागर जैसी।
पिता के अंदर शांत भाव,
होती गागर जैसी।
अंत समय जब चिता में लेटे,
तब भी जलते रहे पिता।
जीवन भर लकड़ी बनके,
जलते रहे पिता।
दुर्गा शंकर वर्मा "दुर्गेश"
रायबरेली।


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