बुधवार, 16 सितंबर 2020

kinnar hindi poem by Astha srivastava-किन्नर-हिंदीं कविता

 kinnar hindi poem by Astha srivastava-किन्नर-हिंदीं कविता

kinnar- hindi -poem- by- Astha- srivastava-किन्नर-हिंदीं कविता
आस्था श्रीवास्तव 
तलवारबाजी में कांस्य पदक विजेता

किन्नर

ठेकेदार बन के जग का,करता सबको जज है,
फिर चाहे मैं हूँ, आप हो, या कोई ओर है।

दूसरों को ही सही करेंगे,ये कसम खायी है,
खुद की ज़िंदगी कहा जा रही, ये तो समझ ना आयी है।

जगह जगह करता अपनी बकवास जस्टिफ़ाई है,
हिजड़ा,छक्का, कह कर हमेशा उनकी आयडेंटिटी बतायी है।

क्या अलग है उनमें, ये बात मुझे आज तक समझ ना आयी है,
इंसान है वह भी शैतान की तरह सकल उनकी भगवान ने नहीं बनाई है

तुम्हारा हक़, जीने का अन्दाज़ तो नही बदल रहे,
फिर तुम क्यू किसी के आगे बढ़ने से डर रहे।

समाज में समान स्थान नही दे सके,
कम से कम उनपे कटाक्ष तो ना करे।

क्यू कोई जीव तुम्हारे डर से खुल कर जी नही रहा,
इंसानियत है? या मानव शरीर में राक्षस रह रहा।

हस्ते क्यू हो, क्या मज़ा मिलता है,
तुम्हारे शरीर से क्या कुछ अलग दिखता है?

खेल सिर्फ़ जज़्बात का है,
अलग नही वो अनोखा है।

ग़लत उसमें नही कुछ,
वो भी इंसान का बच्चा है।

मोहब्बत से बोलता है वो तुझसे,
तू भी मिला कर,हस्ते हस्ते उनसे।

ना जाने क्या कर दी उन्होंने गलती,
पूछते है वो, ओर हाँ, मैं भी।

मिलेगी भी या नही उन्हें कभी इक्वॉलिटी,
उनके लिए कब होगी डिमॉक्रेसी।
उनके लिए कब होगी डिमॉक्रेसी।
आस्था श्रीवास्तव

 

6 टिप्‍पणियां:

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