Climate change| जलवायु परिवर्तन-अनिल कुमार
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| अनिल कुमार |
बदलती जलवायु और हम (विश्व ओजोन दिवस के अवसर पर)
जलवायु परिवर्तन – आज 16 सितम्बर है और इस दिन को विश्व ओजोन दिवस के रूप
में मनाया जाता है | इस संदर्भ में आइये व्यापक सन्दर्भ में बदलती हुई
जलवायु के कारण एवं प्रभावों को समझने का प्रयास करते हैं | हमारे आस-पास
का वातावरण बदल रहा है। गर्मियों में तापमान की अधिकता और वर्षा की
अनियमितता व अनिश्चितता निरंतर बदलता मौसम बदलते वातावरण का संकेत दे रहे
है। पिछले 10 वर्षो के स्वानुभव के आधार पर आप स्वयं बदलती हुई जलवायु को
महसूस कर सकते हैं।
तकनीकी शब्दावली में "किसी स्थान विशेष पर दीर्घकालिक मौसम की
दशाओं को जलवायु की संज्ञा दी जाती है | तापमान,वर्षा वायुदाब ,हवाये
,इत्यादि मौसम की दशाओं के संकेतक हैं।" वैश्विक जलवायु का सन्दर्भ
ग्रहण किया जाए तो सम्पूर्ण पृथ्वी की औसत तापमान,वर्षा,वायुदाब, पवनो की
दीर्घकालिक औसत दशाओं को वैश्विक जलवायु से संदर्भित किया जाता है।
सम्पूर्ण पृथ्वी के औसत वैश्विक जलवायु में होने वाले परिवर्तन को
वैश्विक जलवायु परिवर्तन की संज्ञा दी जाती है|
आज विश्व सभ्यता के पिछले 2000 वर्षो के दौरान सबसे ज्यादा गर्म है।
20 वी शताब्दी के दौरान वैश्विक तापमान लगभग 0.6 % तक बढ़ा है, जिसका
प्रभाव वर्षा की परिवर्तिता,वितरण,वायुदाब ,पवन नियतकालिक वैश्विक पवन
प्रवाह एवं अन्य जलवायु संकेतको पर पडा है। इस कारण वैश्विक जलवायु में
प्रभावी परिवर्तन हुए हैं।
वैश्विक जलवायु परिवर्तन के साक्ष्य –
1-धरातल पर प्रत्यक्ष सतही तापमान की मात्रा में वृद्धि।
2-धरातल पर वर्षा एवं मौसम के प्रतिरूप में परिवर्तन।
3-चरम मौसमी घटनाओं की तीव्रता में वृद्धि।
4-आर्कटिक महासागर की बर्फ का पिघलना।
5-सागरीय सतह में वृद्धि।
6-आइसलैंड व् ग्रीनलैंड की बर्फ का पिघलना।
7-वनस्पतियों व जीव जन्तुओ की कुछ प्रजातियों का स्थांतरण।
8-वसंत में समय पूर्व कोपलो का फूटना।
9-पक्षियों के प्रवास प्रतिरूप में परिवर्तन।|
जलवायु परिवर्तन के कारण- पृथ्वी के भूगर्भिक इतिहास के दौरान पृथ्वी कई
जलवायु परिवर्तन के दौर से गुजरी है। पृथ्वी विविध हिम युगों तथा
अन्तर्हिम युगों से प्रभावित रही है किन्तु ये सभी जलवायु परिवर्तन
प्राकृतिक थे: जिनमे मानवीय क्रियाकलापों की कोई भी भूमिका नहीं थी। 1880
ई. में औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात मानव धरातल पर परिवर्तन करने वाले
सक्रिय कारक के रूप में प्रभावी हुआ है। तीव्र औद्योगीकरण के कारण मानव
ने पृथ्वी के वातावरण को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है, जिसका चरम
प्रभाव हमारे समक्ष जलवायु परिवर्तन के रूप में आया है|
जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारण निम्न है-
1-हरित गृह प्रभाव - हमारी पृथ्वी का वायुमंडल अनेक गैसों से मिलाकर बना
है इसमें 78 % नत्रजन ,21 % ऑक्सीजन एवं शेष 1% भाग कार्बन डाई
ऑक्साइड,मीथेन,नाइट्रस ऑक्साइड, क्लोरो फ्लोरो कार्बन आदि ग्रीन हरित
प्रभाव वाली गैसों से मिलकर बना है।ये गैसे सूर्य से आपतित लघु तरंगी
विकिरण तरंगो के लिए तो पारदर्शी होती हैं किन्तु पृथ्वी से विकिरित
दीर्घ तरंगी विकिरण के लिए अपारदर्शी होती है तथा उन्हें रोककर वायुमंडल
को गर्म रखने के लिए उत्तरदायी है। वायुमंडल में इनकी मात्रा में वृद्धि
से ग्रीन हरित प्रभाव बढ़ा है। इस कारण वायुमंडल के औसत तापमान 15 डिग्री
सेंटीग्रेड में वृद्धि हुई है जो धरातल पर जलवायु परिवर्तन का कारण है।
2- अति औद्योगीकरण।
3- वन अपरोपण।
4- अत्यधिक ऊर्जा की खपत।
5-ब्लैक कार्बन (जीवाश्म ईधनो,जैव ईधनो से निष्कर्षित सूक्ष्म कणकीय प्रदूषक तत्व)।
6-कृषि जनित कारक।
7-परिवहन के साधन।
जलवायु परिवर्तन के विविध आयाम- जलवायु परिवर्तन एक बृहत् संकल्पना है
मानवीय जीवन से सम्बन्धित होने के कारण इसके विविध आयाम है। जलवायु
परिवर्तन के विविध आयाम निम्न हैं-
1- जलवायु परिवर्तन का आर्थिक आयाम।
2- जलवायु परिवर्तन का सामाजिक सांस्कृतिक आयाम।
3- जलवायु परिवर्तन का तकनीकी आयाम।
4- जलवायु परिवर्तन का व्याहारिक आयाम।
5- जलवायु परिवर्तन के विधिक आयाम।
6- जलवायु परिवर्तन का लोकतांत्रिक आयाम।
7- जलवायु परिवर्तन का वैज्ञानिक आयाम।
जलवायु परिवर्तन के ये सभी आयाम मानवीय जीवन से सम्बन्धित है तथा
उसे प्रभावित करते हैं।भारतीय सन्दर्भ में आर्थिक तथा सामाजिक सांस्कृतिक
आयाम एवं उन पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का विश्लेषण किया गया है।
भारतीय समाज पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावो के सन्दर्भ में विडम्बना ये है कि
इनका सर्वाधिक दुष्प्रभाव उन देशो को झेलना पड़ रहा है जिनका इस आपदा में
कोई भी योगदान नही रहा है। जलवायु परिवर्तन के लिए विकसित देशो द्वारा
औद्योगीकरण के दौरान किये गए कृत्य उत्तरदायी हैं, जिनके पश्च्प्रभावो का
दंश वर्तमान में विकासशील देश वहन कर रहे हैं। भूमंडलीय तापन जनित
महामारियाँ,वर्षा का बदलता प्रतिरूप, उष्ण कटिबन्धीय चक्रवातो का बढ़ता
प्रकोप ,बाढ़ एवं सूखा की आवृत्ति में वृद्धि,नवीन महामारियो की आवृत्ति
में वृद्धि आदि प्रमुख प्रभाव हैं| वर्ष 2007 में जलवायु परिवर्तन पर
अंतरसंसदीय पैनल की रिपोर्ट के आधार पर सेंटर फॉर साइंस एवं एनवायरनमेंट
ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि वायुमंडल में 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड
वृद्धि भारत एवं विकासशील देशो के लिए त्रासदी होगी। भारत में वर्षा की
अनियमितता अनिश्चितता में वृद्धि ,बाढ़ एवं सूखा में वृद्धि ,उष्ण
कटिबन्धीय चक्रवातो की तीव्रता में वृद्धि आदि पश्च प्रभावों से भारत को
प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है।
भारत में जलवायु परिवर्तन का आर्थिक आयाम और प्रभाव –भारतीय अर्थव्यस्था
के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं कृषि,उद्योग एवं सेवा क्षेत्र। जी.डी.पी में
कृषि क्षेत्र का 15.4 %,उद्योग का 23% एवं सेवा क्षेत्र का 61.5% योगदान
है। कृषि क्षेत्र जीडीपी में घटते योगदान के बावजूद आज भी सर्वाधिक
रोजगार प्रदाता है लगभग 64% जनसंख्या आज भी रोजगार के लिए कृषि पर निर्भर
है आज वर्ष 2022 में भोजन हेतु 300 मिलियन टन अनाज के उत्पादन की
आवश्यकता है यदि तापमान में 1 डिग्री सेंटीग्रेड की वृद्धि होती है तो
कुल फसल उत्पादन में 5-10% की कमी संभावित है( ipcc report 2001) पिछले
वर्षो में अलनीनो प्रभाव के कारण भी भारत में वर्षा प्रतिकूल रूप से
प्रभावित हुई है। इस वर्ष महाराष्ट्र,कर्नाटक,उत्तर प्रदेश ,झारखण्ड
,बिहार एवं राजस्थान आदि राज्यों में मानसून की प्रतिकूलता के कारण बाढ़
एवं वर्षा जैसे हालात उत्पन्न हुए हैं जिन्होंने फसलो की उत्पादकता एवं
प्रतिरुप को प्रभावित किया है।
भारत में कृषि व् उद्योग गहन रूप से अंतर्संबंधित हैं सूती वस्त्र
उद्योग,चीनी उद्योग,कागज उद्योग,वनस्पति तेल उद्योग आदि उद्योग कृषि
आधारित उद्योग हैं। जलवायु परिवर्तन ने उपरोक्त उद्योगों हेतु कच्चा माल
के उत्पादन को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है। जलवायु परिवर्तन पर
विभिन्न संधियों के अनुपालन में भारत को अपने कार्बन उत्सर्जन को कम करने
का दबाव भी है जिसके कारण भी भारतीय उद्योग प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुए
हैं। जिन वर्षो में मानसून अनियमित रहा है। भारत में उन वर्षो में भारतीय
औद्योगिक वृद्धि दर पर संचयी पश्चप्रभाव दिखाई पड़ता है। स्टेनफोर्ड विवि
अमेरिका के नोह डिफेनबाग ने “नेशनल अकेडमी ऑफ़ साइंस” में प्रकाशित अपने
शोधपत्र में बताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था
प्रत्याशित आकार से 31% छोटी है।
भारत में जलवायु परिवर्तन का सामाजिक व सांस्कृतिक आयाम और प्रभाव –
जलवायु परिवर्तन का भारतीय समाज एवं संस्कृति पर संचयी प्रभाव पडा है।
जलवायु परिवर्तन के पश्चप्रभावों के कारण भारत में उच्च आय वर्ग के/निम्न
आय वर्ग के मध्य असमानता बढ़ी है। निम्न वर्ग के लोग जलवायु परिवर्तन जनित
महामारियो से ज्यादा प्रभावित हुए हैं। भारत में 81805 वर्ग किमी का
क्षेत्र निम्न तुंगता तटीय क्षेत्र है जिसमे रहने वाले 63188208 लोग
समुद्र तल परिवर्तन से सर्वाधिक संभाव्य प्रभावित क्षेत्र में रह रहे हैं
समुद्र तल में हो रहे परिवर्तन के कारण इनके आवासीय क्षेत्र एवं आजीविका
पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। तटीय क्षेत्रो से आंतरिक भागो में बढ़ता प्रवास
इसका परिणाम है। मानसून की अनियमितता के कारण खेती लगातार घाटे का सौदा
बनी हुई है जिस कारण ग्रामीण क्षेत्रो से प्रथम श्रेणी के नगरो में
जनसंख्या विस्फोट की स्थिति उत्पन्न हुई है। खाद्यान्न उत्पादन में
जनसंख्या वृद्धि के सापेक्ष वृद्धि नहीं हो रही है तथा हरित क्रान्ति की
तकनीके जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों का सामना नही कर पा रहे
हैं, परिणामस्वरुप भारत के समक्ष खाद्यान्न संकट उत्पन्न हो रहा है दलहनी
व् तिलहनी फसलो के उत्पादन के संदर्भ में यह स्पष्ट रूप से सामने भी आ
चुका है। परिणामस्वरूप भारतीयों की खान-पान रहन-सहन संबंधी व्यवहार में
परिवर्तन हो रहा है। भारतीय ग्रामो और नगरो की सामाजिक संरचना में
परिवर्तन हुआ है।
जलवायु परिवर्तन रोकने के वैश्विक प्रयास
जलवायु परिवर्तन के निरोधक उपायों को लेकर विश्व दो खेमो में
बंटा हुआ है –
1- विकसित देश सभी देशो के मध्य समान उत्तरदायित्व की बात करते हैं तथा
उनका मानना है कि विकासशील देशो को जलवायु परिवर्तन को रोकने के उपायों
को समान रूप से अपनाना चाहिए।
2- विकासशील देश जैसे भारत ,चीन ब्राजील आदि का मानना है कि वर्तमान
जलवायु परिवर्तन विकसित देशो के अन्धाधुंध औद्योगीकरण एवं गैर जिम्मेदार
नीतियों का परिणाम है अतः विकसित देशो को न्यायसंगत उत्तरदायित्व तथा
विकासशील देशो को प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण करना चाहिए।
इस सन्दर्भ में किये गए प्रमुख वैश्विक उपाय निम्न हैं-
1-वर्ष 1987 में ओजोन परत संरक्षण हेतु मोंट्रियल प्रोटोकॉल।
2-वर्ष 1988 में जलवायु परिवर्तन पर अन्तर्शासकीय पैनल का गठन।
3-वर्ष 1992 में रियो सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन
अभिसमय का अंगीकरण।
4-वर्ष 1997 में कार्बन उत्सर्जन कम करने हेतु क्योटो प्रोटोकॉल के रूप
में प्रथम बाध्यकारी संधि।
5-2007 में बाली कार्य योजना।
6-विभिन्न कोप सम्मेलन।
7-वर्ष 2012 में दोहा सम्मलेन।
8-वर्ष 2016 मराकेश सम्मेलन।
9-वर्ष 2017 बाली सम्मेलन।
जलवायु परिवर्तन पर हुए सभी सम्मेलनों में विकसित एवं विकासशील देशो
के मध्य मतभेद खुलकर सामने आये। इन सम्मेलनों की असफलता का उत्तरदायित्व
मुख्य रूप से विकसित देशो पर है क्योकि वर्तमान जलवायु परिवर्तन के लिए
प्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी होने बावजूद विकसित देश विकासशील देशो पर
ऊर्जा खपत को न्यूनतम करने का दबाव विकासशील देशो पर डाल रहे हैं। जलवायु
परिवर्तन पर विकसित देशो को अपनी नीति में परिवर्तन करना होगा न्याय संगत
बाध्यकारी समझौता एवं उसके क्रियान्वयन हेतु विकासशील देशो को आवश्यक
आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग प्रदान करना होगा तभी जलवायु परिवर्तन से
प्रभावी रूप से लड़ पाना संभव होगा। |
जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए भारत की तैयारी एवं योगदान
भारतीय चिंतन एवं दर्शन में प्रकृति का समादर किया गया है ऋग्वेद में
पृथ्वी व् अन्य प्राकृतिक घटकों को देव मानकर उनकी पूजा की गयी है । उसी
परम्परा को भारतीयों न सदैव अगीकार किया है किन्तु वैश्विक जलवायु
परिवर्तन को रोकने के उपायों के सन्दर्भ में भारत का मत स्पष्ट रूप से
विकासशील देशो के निकट है। भारत का दृष्टिकोण है कि विकसित देशो को
जलवायु परिवर्तन में अपने योगदान को स्वीकार करते हुए न्यायसंगत
उत्तरदायित्व का निर्वहन करना चाहिए | विकासशील देशो को उत्सर्जन कम करने
हेतु आर्थिक व् तकनीकी सहयोग प्रदान करना चाहिये।
वर्ष 2008 में भारत ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए
राष्ट्रीय एक्शन प्लान की घोषणा की थी यह संकेत दिए गए कि यह एक्शन
प्लान आधारभूत संरचना उपलब्ध कराएगा और आठ चिह्नित मिशन पर साल के अंत तक
बहुपक्षीय से बातचीत से विस्तृत मिशन प्लान बनाये जायेंगे। दुर्भाग्य से
उक्त एक्शन प्लान बेहतर क्रियान्वयन नहीं हुआ। विभिन्न मंत्रालयों के
मध्य सामंजस्य का अभाव,लालफीताशाही ,राजनैतिक इच्छाशक्ति का अभाव कारणों
से एकन प्लान कभी एक्शन में आ ही नहीं पाया |भारत सरकार द्वारा नवीकरणीय
ऊर्जा के प्रयोग के लिए प्रभावी रोडमैप का निर्माण नहीं किया गया यह
विरोधाभास ही है कि वैश्विक पटल पर न्यायसंगतता, समानता की बात करने वाला
देश घरेलू नीतियों के निर्माण में उन्ही सिद्धांतो का पालन नहीं करता है।
भारत में वर्तमान सरकार जलवायु परिवर्तन पर सक्रिय प्रतीत हो रही
है। 12 फरवरी 2019 को
केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने “ भारत
जलवायु समाधानों का नेतृत्व कर रहा है” नामक प्रकाशन जारी किया। इस
प्रकाशन में जलवायु परिवर्तन से निपटने और अनुकूलन के लिए विभिन्न
क्षेत्रों के तहत भारत द्वारा की गई प्रमुख कार्रवाइयों का उल्लेख किया
गया ।इस प्रकाशन में जिन पहलों का उल्लेख है वें सतत विकास प्राथमिकताओं
के साथ अच्छा संतुलन कायम करते हुए जलवायु परिवर्तन की चिंताओं का
समाधान करने की दिशा में भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं। ई
मोबिलिटी, हरित ढुलाई,नवीकरणीय ऊर्जा, अपशिष्ट प्रबंधन, वनीकरण और जल
आदि विभिन्न क्षेत्रों में अनेक नई नीतियां और पहल शुरू की गई हैं ताकि
जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम से कम
किया जा सके। अभी हाल में भारत सरकार ने जलवायु परिवर्तन की
चुनौतियों से निपटने के लिए
अनेक पहले शुरू की हैं। भारत सरकार की कुछ प्रमुख पहलों में जलवायु
परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य
योजना (एनएपीसीसी), जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय अनुकूलनता निधि
(एनएएफसीसी), जलवायु
परिवर्तन कार्य योजना (सीसीएटी) और जलवायु परिवर्तन पर राज्य कार्य
योजना (एसएपीसीसी) शामिल
हैं।
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सुझाव
जलवायु परिवर्तन का सबसे दुखद पहलू है कि इससे सबसे ज्यादा
प्रभावित वो लोग/देश हैं जिनका
इसमें नगण्य योगदान रहा है अतःजलवायु परिवर्तन के प्रयासो को
आर्थिक,सामाजिक और पर्यावरणीय
न्याय की दृष्टि से देखने की आवश्यकता है। नीति निर्माण के वांछित
राष्ट्रीय/अन्तर्राष्ट्रीय उद्देश्यों में
विकास से वंचित वर्गो/देशो के हितो का प्रतिनिधित्व होना चाहिए।
तत्संदर्भित प्रमुख सुझाव निम्न है-
अन्तर्राष्ट्रीय नीति निर्धारको के लिए-
1-एनेक्स 1 के देशो पर वर्ष 2030 तक राष्ट्रीय उत्सर्जन में 25-40 %
कटौती करने का बाध्यकारी
समझौता लागू किया जाये।
2-विभिन्न जलवायु परिवर्तन सम्मेलनो में कृषि पर न्यायसंगत चर्चा हो।
3-विकसित देशो द्वारा कार्बन खरीद द्वारा उत्सर्जन में लाई गयी कमी को
उनके कुल उत्सर्जन के 1/3 पर
सीमित रखा जाए।
4-जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए न्यायसंगत आधार पर वैश्विक जलवायु
अनुकूलन निधि की स्थापना
की जाये।
5-विकसित देश विकासशील एवं अविकसित देशो को पर्यावरण सह्य
प्रोद्योगिकी का स्थान्तरण करे।
राष्ट्रीय नीति निर्धारको के लिए -
1-कम कार्बन उत्सर्जन आधारित प्रौद्योगिकी का विकास तथा प्रोत्साहन।
2-विविध सरकारी संगठनों/मंत्रालयों के मध्य बेहतर समन्वयन हेतु कार्य
योजना पर बल।
3-जलवायु परिवर्तन पर 8 कार्य योजनाओ के बेहतर क्रियान्वयन हेतु प्रचुर
निधि तथा राजनैतिक
इच्छाशक्ति।
4-वंचित वर्गो के हितो व् आवश्यकताओ के आधार पर रणनीति का निर्माण।
5-कृषि हेतु पर्यावरण सह्य प्रौद्योगिकी का विकास।
6-राष्ट्रीय स्तर पर विविध योजनाओं का समन्वयन।
7-जलवायु परिवर्तन के खतरों के प्रति जनजागरूकता बढाने के कार्यक्रमों
का निर्माण तथा उनका
प्रचार-प्रसार।
8-वृक्षारोपण को प्रोत्साहन।
अनिल कुमार
सहायक
प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष,डी.एस.एन.कॉलेज,उन्नाव |

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