बुधवार, 9 सितंबर 2020

भारतीय अर्थव्यवस्था, प्रोफेसर अनिल साहू-covid19

 


भारतीय अर्थव्यवस्था, प्रोफेसर अनिल साहू-Covid19


प्रोफेसर अनिल साहू-  इन दिनों अर्थव्यवस्था और जीडीपी को लेकर बुद्धिजीवी अपने-अपने तर्क दे रहे हैं आम जनता भी जीडीपी के बारे में बात करती नजर आएगी लेकिन वास्तव में इसका विश्लेषण सही तरीके से करना जरूरी है ऐसे में प्रोफेसर अनिल साहू ने उसका विश्लेषण किया है। तो आइए समझते हैं प्रोफेसर अनिल साहू की कलम से                                                    


Bharitya-arthvyavastha-review
professor anil sahu
  1. वर्तमान अर्थव्यवस्था को।

अर्थव्यवस्था बड़ा ही पेचीदा विषय है किन्तु सोशल मीडिया और सतही विश्लेषणों ने इसे बहुत ही आसान  बना दिया है | हाल ही में अप्रैल-जून (Q-1 पहली तिमाही ) में अर्थव्यवस्था की सेहत संबंधी जी.डी.पी. वृद्धि दर संबंधी आंकडे जारी किये  गए |सांख्यिकी मंत्रालय के अनुसार पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून के बीच विकास दर में 23.9 फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की गई है| आकड़ो के जारी होने के बाद सोशल मीडिया और मीडिया के एक बड़े हिस्से के द्वारा इसे एक प्रायोजित प्रोपोगंडा की भांति सरकार की विफलता के रूप में प्रचारित किया जा रहा है| ऐसा होना न तो अप्रत्याशित है और ना  ही सरकार की वित्तीय नीतियों की असफलता का परिणाम है वरन covid-19 के कारण लगाए गये  लॉक डाउन का पश्च प्रभाव है| 25 मार्च 2020 से 31 मई 2020 तक चार चरणों में भारत सरकार द्वारा लॉकडाउन लागू किया गया| जिस अवधि में सभी आर्थिक क्रिया -कलापों को बंद रखा गया गया| भारत सरकार ने अर्थव्यवस्था पर  आम जनता के स्वास्थ्य, सेहत को प्राथमिकता दी| जो कि संविधान में निहित लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा की व्यवहारिक परिणति है| दुर्भाग्य से जी.डी.पी. की पहली तिमाही की वृद्धि पर मिथ्या प्रलाप करने वाले लोग , जो सुबह शाम लोकतंत्र और संविधान की दुहाई देते नहीं थकते हैं| उन्होंने सरकार की आलोचना करते समय तथ्यों और संविधान की मूल आत्मा पर ध्यान नहीं दिया| संविधान की प्रस्तावना,मूल अधिकार,नीति-निर्देशक तत्व आदि प्रावधान सरकार को भारतीय नागरिकों के जीवन की रक्षा को प्राथमिकता देने के लिए तत्संबंधी आवश्यक उपाय करने के लिए बाध्य करते है| महाभारत शान्ति पर्व में राजधर्मानुशासन पर्व के अंतर्गत 130वें अध्याय में भीष्म द्वारा आपत्ति के समय राजा का प्रमुख धर्म जनता की रक्षा करना एवं प्रश्रय देना बताया गया है|  आचार्य चाणक्य ने अर्थशास्त्र के  प्रथम अधिकरण, अध्याय 18 में लिखा है-

प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां तु हिते हितम् । 

नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम् ॥ 

 अर्थात प्रजा के सुख में राजा का सुख निहित है, प्रजा के हित में ही उसे अपना हित दिखना चाहिए| जो स्वयं को प्रिय लगे उसमें राजा का हित नहीं है, उसका हित तो प्रजा को जो प्रिय लगे उसमें है। वर्तमान भारत सरकार ने अमेरिका सहित पाश्चात्य देशों के विपरीत, भारतीय दर्शन,परम्परा एवं संविधान के निर्देशों का पालन किया और भारतीय जनता के हितों,जीवन व् सुरक्षा को प्राथमिकता दी| इसके लिए सरकार को साधुवाद व् धन्यवाद दिया जाना चाहिए किन्तु एक बड़ा वर्ग जिसका लक्ष्य मात्र ही सरकार का विरोध करना है विविध माध्यमों से सरकार के विरुद्ध मिथ्या प्रचार में लगा है|                                                                                                                2.अर्थव्यस्था की वृद्धि पर जारी आकड़ों के विश्लेष्ण पर-अब बात करते हैं अर्थव्यस्था की वृद्धि पर जारी आकड़ों के विश्लेष्ण पर दिनांक 8 सितम्बर  2020 को भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविन्द सुब्रमन्यम नें “ऑन इकॉनमी फ़ॉलो एविडेंस” लेखक में जीडीपी वृद्धि दर पर वस्तुस्थिति को स्पष्ट किया है उन्होंने लिखा है “जीडीपी के सम्बन्ध में फैलाई जा रही गलत अवधारणाओं को समझना होगा जीडीपी एक परिवर्तनशील चर है हाल में जारी किये गए आंकड़े अप्रैल-जून की आर्थिक क्रियाओं पर आधारित है पिछली तिमाही से इसकी तुलना बिना लॉकडाउन के प्रभाव का आंकलन करना गलत विश्लेषण है| और न  ही यह वृद्धि दर पिछले 12 महीने की वृद्धि दर को दर्शाती  है|” वास्तव में मात्र एक तिमाही की जीडीपी वृद्धि दर को  भारत की सम्पूर्ण आर्थिक वृद्धि दर दर्शाना केवल जनता को गुमराह करना है| बचपन की एक कहानी याद आती है जब पांच अंधे व्यक्तियों ने अपने अनुभव के आधार पर हाथी के स्वरुप का आंकलन किया था| अफ़सोस है कि बुद्धिजीवी भी तथ्यों का विश्लेषण करने के स्थान पर अफवाहों पर बल दे रहे हैं|                                                                                              3.प्रोफेसर साहू की कलम से विश्लेषण विकसित देशो की स्थिति-Covid -19 के दौरान भी अमेरिका और ब्राजील जैसे देशों नें लॉकडाउन लागू नही किया परिणामस्वरूप भारत की तुलना में उनकी वृद्धि दर पर नकारात्मक प्रभाव तुलनात्मक रूप से कम पडा, किन्तु covid-19 से हुई मौतों की तुलना की जाये तो भारत की तुलना में उनका औसत बहुत अधिक है| अर्थव्यस्था के विभिन्न क्षेत्रों पर लॉक डाउन का नकारात्मक प्रभाव पडा है जिसका प्रस्फुटन पहली तिमाही में  जीडीपी में नकारात्मक वृद्धि दर के रूप में हुआ है| इसे सरकार के प्रदर्शन या विफलता के रूप में देखा जाना उचित नहीं है| लॉकडाउन की अवधि में सार्वजनिक वितरण प्रणाली एवं स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से सरकार ने राजधर्म के उच्च आदर्शों का पालन किया है|इसके तहत 80 करोड़ ग़रीबों को तीन महीने तक मुफ़्त आटा या चावल और एक किलो दाल देने की घोषणा की गई| इसके अलावा ग़रीब महिलाओं को सिलेंडर भी मुफ़्त में दिया गया|1.70 लाख करोड़ रुपये  पैकेज के द्वारा ग़रीबों के लिए खाने का इंतज़ाम किया गया  और डीबीटी के माध्यम से पैसे भी ट्रांसफ़र किए गये|भारत जैसे बड़ी जनसंख्या वाले देश में यह लोककल्याण का बड़ा प्रयास था|

4.        अनलॉक की प्रक्रिया के साथ ही भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत मिलनें लगे हैं विविध क्षेत्रों में सुधार के संकेतों को निम्न तालिका से समझा जा सकता है –

अन्य संकेतक अगस्त 2020  माह में सुधार 

रेल माल ढुलाई यातायात 107 %

इस्पात उत्पादन 86%

सीमेंट उत्पादन 87%

जी.एस.टी. संग्रहण 88%

यूपीआई पेमेंट ट्रांजेक्शन का मूल्य 198%

कोर औद्योगिक सूचकांक 90%

खरीफ फसल के क्षेत्र में वृद्धि 107%

आई.आई.आई. में वृद्धि 83%

      
स्रोत-ऑन इकॉनमी ,फॉलो एविडेंस,अरविन्द सुब्रमन्यम  (इन्डियन एक्सप्रेस 8सितम्बर2020)

 निश्चित रूप से रोजगार के अवसरों का सृजन,निर्धनता,आधारिक संरचना की कमी,शिक्षा,स्वास्थ्य आदि विषयों पर राष्ट्रीय आकांक्षाओं के अनुरूप सरकार से अपेक्षाएं हैं यह न केवल सरकार की जिम्मेदारी है वरन जनता के प्रति ऋण भी है| किन्तु तथ्यों की गलत व्याख्या न  करके जिस प्रकार का भय व् अविश्वास का वातावरण बनाया जा रहा है वह संकट की घड़ी में उचित नहीं है| सरकार के साथ हमें अपने उत्तरदायित्व को भी समझना होगा|अर्थव्यस्था को इस अवस्था से निकालने के लिए सरकार विविध नीतिगत उपाय किये गए हैं जिसमें आत्मनिर्भर भारत अभियान,प्रधानमंत्री किसान योजना,खाद्य सुरक्षा,मनरेगा के अधीन रोजगार सृजन पर बल दिया है| आर्थिक वृद्धि के चार  इंजनो उत्पादन,उपभोग,निवेश एवं निर्यात पर विशेष ध्यान देकर आर्थिक वृद्धि को सकारात्मक बनाया जा सकता है इसके लिए क्रमिक रूप से नगरीय भारत और ग्रामीण भारत के मध्य अंतर को पाटना होगा|एक ऐसे विकास के माडल को प्रोत्साहन देना होगा जिसका केंद्र भारत हो आर्थिक असमानता की खाई को कम करनें के प्रयास करनें होंगे क्योकि लॉक डाउन की अवधि में भारत सरकार के व्यय का बडा हिस्सा लोगो को खाद्यान की आपूर्ति करनें में खर्च हुआ जिससे विकसित देश बचे रहें| भविष्य में ऐसी आपदा से बचनें के लिए रणनीति तैयार करने होगी| अंत में सरकारों का मूल्यांकन होना चाहिए किन्तु ये मूल्यांकन वास्तविक तथ्यों पर आधारित हों ना की कूटरचित या पूर्वाग्रह से ग्रसित विश्लेषण पर आधारित हो|

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