Prem path hindi poem for love
प्रेम पथ
बहुत दूर जाके भी मुड के न देखा,
मैं उनके ही सपने सजाती रही हूँ,
उन्होंने तो जी भर के की बेवफाई,
मैं फिर भी वफा को निभाती रही हूँ,
बहुत दूर जाके भी मुड के न देखा,
मैं उनके ही सपने सजती रही हूँ। १।
मेरे मन की प्रियतम ने पीड़ा न समझी,
गये छोड़ हमको मझधार में वो,
रही जल में जलती तड़फती मचलती,
मगर उनके गुन गुनगुनाती रही हूँ,
बहुत दूर जाके भी मुड के न देखा,
मैं उनके ही सपने सजाती रही हूँ। २।
गये छोड़ गोकुल बसे जाके मथुरा,
सिला ये दिया है मेरे प्रेम पथ का,
भटकती हूँ मैं कुंज गलियों फिर फिर,
नयन नीर दर दर बहाती रही हूँ,
बहुत दूर जाके भी मुड के न देखा,
मैं उनके ही सपने सजाती रही हूँ।३।
सभी कहते हैं तुम हो करुणा के सागर,
तो अरविंद की ये भरी क्यों न गागर,
बताओ तुम्ही फैसला तुम ही करदो,
कि किन गलतियों की सजा पा रही हूँ,
बहुत दूर जाके भी मुड के न देखा,
मैं उनके ही सपने सजाती रही हूँ । ४।


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