शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

poem on Environmental awareness/ पर्यावरण -चेतना

 poem on Environmental awareness

  पर्यावरण -चेतना

poem- on- Environmental- awareness

 

गंगा पुकारती रही ,

यमुना कराहती रही

दूषित ना तुम करो हमें ,

मैया  पुकारती  रही 

 

हम कैसे  मातॄ - भक्त हैं ,

 अपवित्र  करते  ही  रहे

मां  क्षमा  करुणामयी   ,

 फिर  भी  दुलारती  रही

 

हम  पन्नियां - कागज़ रसायन

   मल  बहाते  ही   रहे  

पावन  नदी को  मलिन कर ,

  दूषित  बनाते  ही   रहे  

 

 मोक्ष  की  परिकल्पना  में ,

विकॄत   किया  पर्यावरण 

बीमारियों  की   महफिलें  ,

घर -घर  सजाते  ही  रहे 

 

हर तरफ  कचरा ही  कचरा ,

 दूषित  किया  पर्यावरण 

गली - कूचे - राजपथ   ,

 धुएं  में  डूबे  परिवहन   

 

अब  सांस  लेना  भी कठिन ,

पवन  भी  विषैली हो  गई 

कल - कारखानों- वाहनों  ने ,

कर  दिया  है   आक्रमण 

 

अब ना  दिखते हरित वन  ,

 चलती  वहां  कुल्हाड़ियां

जाएं  कहां पशु - पक्षी अब ,

 सूखी   दिखें   पहाड़ियों 

 

वन - सम्पदा   श्री हीन   ,

सूखा  है  कहीं पर बाढ़ है

दूषित   हुआ  पर्यावरण  ,

 धुआं   उगलती  गाड़ियां 

 

नगरों  में  बढ़ता  शोरगुल  ,

जीना  हुआ  दुश्वार  है 

मस्तिष्क  के  रोगी   बढ़े  ,

सुनने  से  भी  लाचार  हैं 

 

सूरज  उगलता   आग   ,

तपती सड़क सड़ती गंदगी  

दूषित हवा  -- बढ़ता  दमा  ,

रोगों  की  अब भरमार  है 

 

जागो  नगर  के   वासियो ,

अपना नगर निर्मल  करो 

स्वच्छता पर ध्यान ध्वनि की ,

  तीव्रता   को   कम   करो 

 

घर - घर  लगाओ  पेड़ ,

पाॅलीथीन  से नफ़रत करो

कचरा  ना  फैलाओ  - नगर

स्वच्छ और  निर्मल    करो 

 

चेतो  नगर   के  वासियो  ,

उगाओ  फूल  घर - घर  में

नगर  हो स्वच्छ निर्मल  ,

शुद्धि  अपनाओ हर घर में 

 

उगाओ  पेड़ - वन - उपवन ,

बुझाओ  प्यास  खेतों  की 

पथिक -  दो   त्याग पाॅलीथीन

 थैला   लाओ  घर--चर  में ।।

poem- on- Environmental-awareness
सीताराम चौहान पथिक

 

   

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