dastak hindi kavita
दस्तक
वक्त ने दी है ये दस्तक ,
ज़िन्दगी के द्वार पर ।
बज कर अलार्म कह रहा ,
इन्सानियत से प्यार कर ।
छोड़ दें जुल्मों - सितम ,
तू एक दिन पछताएगा ।
कोई ना होगा साथ ,
अपने आप से डर जाएगा ।
आएगा एक दिन भी वो ,
टकराएगा जब मौत से ।
तब बहुत तकलीफ़ होगी ,
तौबाह कर उस खौफ से ।
अपने दामन को ना रंग ,
इन्सानियत के खून से ।
ज़मीर को जख्मी ना कर ,
वहशी बने जुनून से ।
हर तरफ बर्बादियों के ,
कहर ढाता जा रहा है ।
कौनसा मज़हब है तेरा ,
जो तुझे सिखला रहा है ।
हर मज़हब इन्सानियत की ,
राह पर चलना सिखाता ।
यही है वो रास्ता जो ,
खुदा के नजदीक लाता ।
क्यों मज़हब के नाम पर ,
मासूम के घर को जलाता ।
खूबसूरत है ये दुनिया ,
ये चमन जिसको मिटाता ।
अल्लाह के गुमराह बच्चे ,
अल्लाह की लाठी से डर ।
बे - शक ये--बे - आवाज है ,
तड़पाएगी बस याद कर ।
वक्त ने अब दी है दस्तक ,
मत उलझ शैतानियों में ।
वरना तेरी दास्तां ------ ,
मिट जाएगी गुमनामियों में ।
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| सीताराम चौहान पथिक |
+91- 9650621606
सीताराम चौहान पथिक


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