सोमवार, 26 अक्टूबर 2020

पेंशनर्स की व्यथा-penshanars kee vyatha-डॉ.संपूर्णानंद मिश्र

 penshanars kee vyatha

penshanars -kee- vyatha
पेंशनर्स की व्यथा

*पेंशनर्स की व्यथा*

-----------------------------

खो देता है

बुद्धि, विवेक मनुष्य

प्राप्त करने में इसको

रेत देता है गला संबंधों का भी

बड़ी ताकत होती है पैसे में

थमाई जाती है

असहाय बूढ़े हाथों

में लाठियां इसीलिए

ताकि कर दे

एक हस्ताक्षर कांपते हाथों से

बंट जाता है पिता पैसों की तरह

नहीं मिल पाता है प्रेम किसी का

नोचने लगते हैं अपने ही उसे

मिली होती है माहुर प्रेम- बोल में

सोखकर रस

उड़ जाते हैं सारे पक्षी

अपने- अपने घोंसलों में

एहसास होना चाहिए

जहां उसे अपनों का

स्वार्थ की बू आने लगती है वहां

घुट घुट कर जीने लगता है

ढह जाती है

उसकी उम्मीदें आखिरी

आत्मजन के

स्वार्थ रूपी जे० सी० बी० से

वह पेंशनर्स

खून से सींचता है जीवन भर

जिस परिवार वाटिका को

उजड़ता देखकर

अंधेरा छा जाता है सामने उसके

छल लिया जाता है महीने की

पहली तारीख को अपनों द्वारा

दम तोड़ देती हैं अन्ततः

जीने की उसकी ख़्वाहिशें

penshanars- kee -vyatha
डॉ.संपूर्णानंद मिश्र

 

संपूर्णानंद मिश्र

प्रयागराज फूलपुर

 

 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

सभी साथियों से अनुरोध है कि यदि आपकी मातृभाषा हिंदी है,
तो यहाँ अपनी टिप्पणी भी हिंदी (देवनागरी लिपि)
में ही प्रकाशित करने की कृपा कीजिए!
टिप्पणी पोस्ट करने से पहले
ई-मेल के द्वारा सदस्यता ले लिया कीजिए,
ताकि आपकी टिप्पणी प्रकाशित होने के बाद में यहाँ होनेवाली चर्चा का पता भी आपको चलता रहे और आप बराबर चर्चा में शामिल रह सकें!