hindi poem on maanavata ke jhande
मानवता के झंडे
आओ हम सब भी वह गाएँ, जिसे मनीषी गाए हैं,
अखिल विश्व में मानवता के, झंडे नित फहराए हैं।
जिसे श्रवण कर पुरुषोत्तम भी,सगुण रूप धर आए हैं,
देव-दनुज-किन्नर-नर श्रेणी, सब ने शीश झुकाए हैं।
बहुत हो चुका चीन-पाक ये,कैसे पर फैलाए हैं,
लगता जैसे यम पुर चलना,ऐसे कदम उठाए हैं।
रौंद चलेंगे सारी धरती,अपने हाथ मिलाए हैं,
धरती के जीवन से लगता,बहुत अधिक उकताए हैं।
कोरोना के बीज वपन कर,चीन लगे कितना प्यारा,
जेठ माह का सूरज क्या है,इतना उच्च लगे पारा।
धनी और निर्धन क्या भू के,लगता हरि भी ज्यों हारा,
खंड-खंड भूतल करने को,चीन हुआ पुच्छल तारा।
उल्टी गिनती शुरू हो चुकी, बच्चों तुम भी दुहराओ,
भारत के संयम की भाषा,दिशा-दिशा में फैलाओ।
चीन भले हौव्वा दिखता हो,रंच नही पर घबड़ाओ,
सरस्वती जो इस क्षण बोलें, साथ- साथ सब दुहराओ।
सीमा की रक्षा के खातिर, माँ का आँचल लहराया,
दुश्मन की छाती पर चढ़ कर,नर्तन को मन हर्षाया।
बोल भारती लिखे लेखनी,रिपु दल देखो घबड़ाया,
भागो चलो छिपो निज भीतर,रक्त भारती उमड़ाया।
बाबा कल्पनेश।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
सभी साथियों से अनुरोध है कि यदि आपकी मातृभाषा हिंदी है,
तो यहाँ अपनी टिप्पणी भी हिंदी (देवनागरी लिपि)
में ही प्रकाशित करने की कृपा कीजिए!
टिप्पणी पोस्ट करने से पहले
ई-मेल के द्वारा सदस्यता ले लिया कीजिए,
ताकि आपकी टिप्पणी प्रकाशित होने के बाद में यहाँ होनेवाली चर्चा का पता भी आपको चलता रहे और आप बराबर चर्चा में शामिल रह सकें!