Sad poem on Maa -वही गीत की तान छेड़ दो,माँ जो तुमने गाये थे
![]() |
| शिक्षिका और कवित्री पुष्पा श्रीवास्तव "शैली" |
शिक्षिका और कवित्री पुष्पा श्रीवास्तव "शैली" ने मां के ऊपर एक बेहतरीन कविता लिखी है इस कविता में बचपन में मां की गोद से लेकर चलने तक के सफर में मां के त्याग और सहयोग को प्रदर्शित किया गया है।
वही गीत की तान छेड़ दो,माँ जो तुमने गाये थे।
याद बहुत आते वो नूपुर,जो तुमने पहनाये थे।
बहुत बार जब गिरी धरा पर,
दौड़ दौड़ तुम आती थी।
झाड़ पोछ कर हमें उठाती,
फिर फिर गले लगाती थी।
भूल गयी गुर उठने का मैं,जो तुमने सिखलाये थे
वही गीत की तान छेड़ दो,माँ जो तुमने गाये थे।
कैसे तुम चंदा मामा को,
मेरे पास बुलाती थी।
कैसे लोरी की डोली पर
निंदिया को ले आती थी।
उलझे बालों को माँ तुमने,फिर कैसे सुलझाए थे
वही गीत की तान छेड़ दो,माँ जो तुमने गाये थे।
शिकन तुम्हारे मुख से अम्मा,
कोसों दूर रहा करती।
अब समझी तुम सरि थी अम्मा,
निच्छल नीर बहा करती।
ढूंढ न पायी मैं तो सुख के,मोती कहां छिपाये थे
वही गीत की तान छेड़ दो,माँ जो तुमने गाये थे।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
सभी साथियों से अनुरोध है कि यदि आपकी मातृभाषा हिंदी है,
तो यहाँ अपनी टिप्पणी भी हिंदी (देवनागरी लिपि)
में ही प्रकाशित करने की कृपा कीजिए!
टिप्पणी पोस्ट करने से पहले
ई-मेल के द्वारा सदस्यता ले लिया कीजिए,
ताकि आपकी टिप्पणी प्रकाशित होने के बाद में यहाँ होनेवाली चर्चा का पता भी आपको चलता रहे और आप बराबर चर्चा में शामिल रह सकें!